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वीर सावरकर का मुकदमा । Veer Savarkar Case

वीर सावरकर का मुकदमा । Veer Savarkar Case विनायक दामोदर सावरकर का मुकदमा यह दिखाता है कि सन् १९१० के उस दौर में , जब भारत में ब्रिटिश शक्त...

वीर सावरकर का मुकदमा । Veer Savarkar Case

विनायक दामोदर सावरकर का मुकदमा यह दिखाता है कि सन् १९१० के उस दौर में, जब भारत में ब्रिटिश शक्ति अपने शिखर पर थी, महान क्रांतिकारी वीर सावरकर को पकड़ने और बंदी बनाने के अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कानून और कार्यविधि को किस तरह तोड़ा-मरोड़ा था । सावरकर का मुकदमा--'द हेग' में मध्यस्थ निर्णय अदालत के समक्ष 'फ्रांस बनाम ग्रेट ब्रिटेन' और फिर भारत में किया गया मुकदमा समकातीन न्यायिक और राजनीतिक इतिहास की युगांतरकारी घटना थी । उसका संबंध राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के न्यायिक मसलों से था । अदालत में ब्रिटिश सरकार ने अपने पक्ष में फैसला कराने के लिए जिस तरह एड़ी-चोटी का जोर लगाया और बिना किसी अपील के विशेष ट्रिब्यूनल द्वारा जिस तरह वीर सावरकर को दो बार आजीवन कारावास का दंड दिया, वह न्यायिक इतिहास की ऐसी अपूर्व घटना है, जो ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा अपनी प्रजा पर किए जाने वाले अन्याय को दर्शाती है ।


 

सावरकर के जीवन का एक ही उद्देश्य था - किसी भी तरीके से मातृभूमि को विदेशी दासता से मुक्त कराना । महान देशभक्त, क्रांतिकारी और स्वाधीनता सेनानी सावरकर अपने छात्र जीवन से ही राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े रहे थे । वह भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्षरत समिति 'अभिनव भारती' के भी सक्रिय सदस्य थे ।

 

राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए सावरकर ने इंग्लैंड जाने का निश्चय किया, जिससे ब्रिटिश जनता और पूरे विश्व को, भारतीय जनता के साथ हो रहे अन्याय, दमन और शोषण के प्रति जागरूक किया जा सके । लेकिन एक प्रतिभाशाली छात्र होने के बावजूद अपने पैसे पर विदेश जाना उनके लिए संभव न था । बंबई में कानून की पढ़ाई करते वक्त उन्होंने सुना था कि इंग्लैंड में कार्यरत महान देशभक्त बैरिस्टर श्यामकृष्ण वर्मा विदेश-शिक्षा के उत्सुक, जरूरतमंद भारतीय छात्रों को वजीफा देते हैं । महान भारतीय नेता बाल गंगाधर तिलक, सावरकर की अपने देश के प्रति निष्ठा से परिचित थे । उनकी अनुशंसा पर सावरकर को इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए स्कालरशिप मिली । सन् १९०६ में सावरकर लंदन पहुंचे और शिक्षा प्राप्त करने में डूब गये । उन्होंने अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों में भी किया और वह उन भारतीयों से सक्रिय रूप से जुड़े, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विचारों का प्रचार-प्रसार और भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन कर रहे थे । लंदन में अपने पांच सालों के आवास के दौरान उन्होंने ब्रिटिश भूमि पर खुलेआम ब्रिटिश कानूनों के विरुद्ध कोई कार्यवाही तो नहीं की लेकिन राजनीतिक क्रियाकलापों में उनकी भागीदारी से ब्रिटिश सरकार इतनी तंग आ गयी थी कि उनके खिलाफ कार्यवाही करने के बहाने खोज रही थी ।

 

उनकी आवाज को दबाने और उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अंग्रेजों ने एक संदिग्ध तरीका अपनाया । भारत सरकार ने सावरकर को उनकी राजनीतिक गतिविधियों के लिए अपराधी और फरार व्यक्ति घोषित किया और ब्रिटिश सरकार से उन्हें भारत वापिस भेजने को कहा, ताकि उन पर मुकदमा चलाया जा सके । एक छात्र के रूप में विधिवत पासपोर्ट पर इंग्लैंड गये सावरकर पर फरार अपराधी अधिनियम, १८८१ के तहत अभियोग लगाया गया । एक अभूतपूर्व कार्यवाही में अंग्रेज सरकार ने जिन आरोपों पर २२ फरवरी १९१० को बो स्ट्रीट कोर्ट, लंदन से उनकी गिरफ्तारी का वारंट निकला,

वे यूं थे :

(1) भारत में महामहिम सम्राट के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने को उकसाना ।

(2) महामहिम सम्राट को ब्रिटिश इंडिया या उसके एक भाग के आधिपत्य से वंचित करने का षड्यंत्र करना ।

(3) अस्त्र-शस्त्र एकत्र करना और बांटना तथा जैक्सन की हत्या के लिए उकसाना ।

(4) लंदन में अस्त्र-शस्त्र जोड़ना, बांटना और लंदन से युद्ध छेड़ना ।

(5) मार्च १९०६ से भारत में और १९०८ से १९०९ के बीच लंदन में बगावत की भावना से भरे हुए भाषण देना ।

 

भारत में सन् १९०६ में दिए गये तथाकथित भाषणों के लिए उन्हें इंग्लैंड में सन् १९१० में गिरफ्तार किया गया । १४ मार्च १९१० को उन्हें बो स्ट्रीट की पुलिस कोर्ट में पेश किया गया । कुछ समय के बाद २० अप्रैल को मैजिस्ट्रेट ने उन्हें जमानत पर रिहा करने से इंकार कर दिया और बो स्ट्रीट की पुलिस हिरासत से सावरकर को इंग्लैंड की ब्रिक्स्टन जेल में लाया गया, जिससे आगामी आदेश आने पर उन्हें मुकदमे के लिए भारत भेजा जा सके ।

 

१२ मई को बो स्ट्रीट मजिस्ट्रेट ने फैसला किया कि तथाकथित अपराधों के लिए मुकदमा चलाने के लिए सावरकर को भारत सरकार के हवाले कर दिया जाये । सावरकर के वकील श्री वाग्घन ने बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका दायर की और बो स्ट्रीट कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी अपील की । डिविजनल कोर्ट द्वारा २ और ३ जून को याचिका और अपील की सुनवाई की गयी । न्यायाधीश ने बो स्ट्रीट के निर्णय की पुष्टि की और अपील तथा याचिका दोनों को नामंजूर कर दिया । पुनः हाई कोर्ट में एक अपील दाखिल की गयी, लेकिन ब्रिटिश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री वाग्धन विलियम्स ने डिवीजनल कोर्ट के निर्णय की पुष्टि करते हुए सावरकर को उच्चाधिकारियों के सुपुर्द करने का अनुमोदन किया जिससे उन्हें भारत ले जाया जाये और एक विशेष अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल द्वारा उन पर मुकदमा चलाया जाये ।

न्यायाधीश कालरिज ने अल्पमत में होते हुए भी इस फैसले से असहमति व्यक्त की, लेकिन बहुमत की राय में उन्हें भारत भेजने के निर्णय की पुष्टि की गयी । सावरकर को जुलाई 1910 तक ब्रिटिश जेल में रखा गया और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उन्हें भारत भेजने की तैयारियां होती रहीं । पहली जुलाई १९१० को सावरकर को भारत ले जाने वाले स्टीमर “एस.एस. मोरिया” ने अपनी ऐतिहासिक यात्रा आरंभ की । जहाज पर कड़े सुरक्षा प्रबंध किए गये थे । एस. एस. मोरिया में इंजन की कुछ खराबी पैदा हो गयी और उसे जबरन ७ जुलाई १९१० को मर्साई पर लंगर डालना पड़ा । इंग्लैंड से जहाज के चलने से पहले २९ जून १९१० को ब्रिटिश सरकार ने फ्रांस की सरकार को यह हिदायत दी थी कि एस.एस. मोरिया एक खतरनाक राजनीतिक कैदी को लेकर भारत जा रहा है और अगर वह मर्साई में रुकता है, तो उस पर कड़ी निगरानी रखी जाये । लंदन के सी.आई.डी. अधिकारी श्री पारकर और बंबई के पुलिस उपनिरीक्षक श्री पॉवर कैदी पर कड़ी नजर रखे हुए थे ।

 

जहाज जब मर्साई पर मरम्मत के लिए रुका तो सावरकर ने भाग निकलने का निश्चय किया । यूरोप के साथी क्रांतिकारियों द्वारा उन्हें छुड़ाने की योजना बनाई गयी थी । लेकिन सावरकर को इसकी जानकारी नहीं थी । यह काम सिर्फ खतरे का ही नहीं, बल्कि बड़े जोखिम का था और सावरकर ने बड़ी चतुराई और विलक्षण विवेक से काम लिया । उन्होंने गार्ड से कहा कि वह उन्हें शौचालय तक ले जाए । वहां पहुंचकर उन्होंने अपना नाइट गाउन उतारा और पॉटहोल से निकलकर समुद्र में कूद गये । गार्ड ने उन्हें कूदते हुए देख लिया और शोर मचा दिया । भागते हुए कैदी पर उसने गोलीबारी शुरू कर दी । गोलियों को बौछारों के बीच तैरते-तैरते सावरकर फ्रांस के तट पर पहुंचे । जहाज के गार्डो ने भी उनका पीछा किया । सावरकर भागकर फ्रांसिसी जमीन पर बंदरगाह के ५०० गज दूर तक पहुंचे और वहां ड्यूटी पर खड़े एक फ्रेंच सिपाही से उन्होंने अनुरोध किया कि वह उन्हें निकट के पुलिस मजिस्ट्रेट तक ले जाये, लेकिन फ्रेंच सिपाही ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया । उनका पीछा करने वाले गार्ड "चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो" कहते हुए भागकर आये और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध जबर्दस्ती उन्हें फ्रेंच सिपाही से झपट लिया । यह सावरकर के साथियों का दुर्भाग्य रहा कि वे लोग कुछ घंटे देरी से पहुंचे । ८ जुलाई १९१० को सावरकर के निकल भागने के साहसी, किंतु असफल प्रयास ने विश्व की अंतरात्मा को झकझोर दिया ।

 

पहली बार विश्व भर में एक भारतीय के मुक्ति संघर्ष की चर्चा हुई । सावरकर के भाग निकलने के प्रयास को विश्व के समाचार-पत्रों ने अभूतपूर्व, साहसिक और रोमांचकारी कहा । सावरकर को जबर्दस्ती एस. एस. मोरिया वापिस ले जाया गया, जहां उन्हें जंजीरों में बांधकर रखा गया । जहाज भारत के लिए रवाना हुआ और इडन पहुंचा, जहां उन्हें कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में एक दूसरे जहाज एस. एस. सास्ती में स्थानांतरित किया गया । गार्डो ने उन्हें एक बहुत छोटे, चार फुट के चौकोर केबिन में डाल दिया, जहां वह सिर्फ खड़े ही हो सकते थे, चल-फिर नहीं सकते थे । उन्हें सूरज की रोशनी तक नसीब न थी । हथकड़ी लगाए, पहरे में बंद, सावरकर इन स्थितियों का सामना करते हुए, अविजित हौसला लिए भारत पहुंचे । वह उस समय केवल २२ वर्ष के थे ।

 

एस. एस. सास्ती बिना किसी दुर्घटना के बंबई पहुंचा । २२ जुलाई १९१० को भारतीय क्रांतिकारियों के राजकुमार सावरकर का बबई के बंदरगाह पर उचित स्वागत-सत्कार किया गया । हथकड़ी लगाकर उन्हें खिची हुई तलवारों की कतारों के बीच से ले जाया गया । एक बंद मोटरगाड़ी ने उन्हें एक सुरक्षित विशेष गाड़ी में छोड़ा जिसने उन्हें नासिक की पुलिस हिरासत तक पहुंचाया । कुछ दिन बाद उन्हें पुणे की यरवदा जेल में लाया गया, जहां उनके वकील श्री जोसेफ बप्तिस्ता ने (जिनके पास पहले ही लंदन के वकील श्री वाग्यन द्वारा सभी कागजात पहुंच चुके थे) १३ सितंबर १९१० को मैडम कामा के कहने पर उनसे मुलाकात की ।

 

भारत सरकार ने विधिवत अदालत में सावरकर पर मुकदमा चलाने से डर कर एक विशेष अध्यादेश के अंतर्गत एक विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना की जिससे कि मुकदमा बिना किसी जूरी के चलाया जा सके और अभियुक्त को अपील करने का अधिकार तक न दिया जाये । इस ट्रिब्यूनल में बंबई के प्रधान न्यायाधीश सर बेसिल स्कॉट, सर एन.जी. चन्द्रावरकर और न्यायमूर्ति श्री हीटन थे । अभियोग पक्ष के वकीलों में बंबई के एडवोकेट जनरल श्री जारडीन, श्री वेलडन, सर वेलिंकर और सरकारी वकील श्री निकोल्सन थे । बचाव पक्ष में प्रसिद्ध कानूनविद् थे - श्री जोसेफ बप्तिस्ता, श्री चित्रे, श्री गोविन्दराव गाडगिल और श्री रांगनेकर ।

 

इस विशेष ट्रिब्यूनल की रचना सावरकर के खिलाफ तीन मुकदमे सुनने के लिए की गयी थी । पहले का संबंध ३८ अभियुक्तों से था, जिनमें सावरकर भी एक थे, दूसरे का संबंध सावरकर और गोपालराव पाटांकर से था, जो पहले मुकदमे में भी सह-अभियुक्त थे, और तीसरा मुकदमा सिर्फ सावरकर के खिलाफ था । उन पर आठ अलग-अलग अभियोग लगाए गये थे । काशीनाथ अंकुशकर, दत्तात्रेय जोशी, डब्ल्यू.आर. कुलकर्णी और इंडिया हाउस के रसोइए चतुर्भुज, जिसके हाथों २० ब्राउनिंग पिस्तौलें भारत भेजने का आरोप था, सरकारी गवाह बनाये गये थे ।

 

मुख्य अभियोक्ता श्री जारडीन ने अपने भाषण से मुकदमे का आरंभ किया, जिसमें पहला दिन गुजर गया । २६ सितंबर को अदालत जब दोबारा लगी, तो ट्रिब्यूनल के सामने यह बहस की गयी कि इस मुकदमे को स्थगित कर दिया जाए और मर्साई में गिरफ्तारी के खिलाफ सावरकर की याचिका फ्रांसिसी और ब्रिटिश सरकारों को भेज दी जाये । इस आपत्ति को नामंजूर कर दिया गया । २७ और २८ सितंबर को एडवोकेट जनरल ने अपना भाषण जारी रखा । दो सरकारी गवाहों की गवाहियों के बाद अदालत ने सावरकर से कहा कि अगर वह चाहें, तो उन गवाहों से जिरह कर सकते हैं । इस पर सावरकर खड़े हुए और उन्होंने ट्रिब्यूनल के सामने एक निर्भीक वक्तव्य दिया । उन्होंने कहा कि वह भारत सरकार द्वारा उन पर मुकदमा चलाने के न्यायाधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं और उन्हें फ्रांस में पनाह लेने और फ्रांसिसी कानून का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है । उन्होंने आगे कहा कि वह खुद को पूरी तरह उस फ्रांस पर छोड़ चुके हैं, जो 'स्वाधीनता, समानता और बंधुत्व' का दम भरता है, इसलिए वह इस मुकदमे में बिलकुल भाग नहीं लेंगे । सावरकर के वकील श्री बप्तिस्ता ने भी यह मुद्दा उठाया कि फ्रांसिसी भूमि पर सावरकर की गिरफ्तारी गैर-कानूनी है । अदालत ने पहली अक्तूबर १९१० को इन सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया ।

 

प्रत्यर्पण अधिनियम के प्रावधान पर भी विचार किया गया। अदालत द्वारा सावरकर को इस पर टिप्पणी करने को कहा गया, तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया । अदालत ने तब फैसला दिया कि मर्साई में सावरकर की गैर-कानूनी गिरफ्तारी किसी भी मायने में भारतीय न्यायालय के मुकदमा चलाने के अधिकार को बाधित नहीं करती । मुकदमा जारी रहा । मुकदमे के दौरान अभियोग पक्ष ने सावरकर पर महामहिम सम्राट के विरुद्ध युद्ध करने का आरोप वापिस ले लिया । अतः दूसरा मुकदमा शुरू होने के पहले ही खत्म हो गया । लगभग तीन सौ गवाहों से जिरह की गयी और अनेक दस्तावेज दाखिल किए गये ।

 

ज्यादातर गवाहों ने अदालत को शिकायत की कि उन्होंने यंत्रणा से बचने के लिए और अपने संबंधियों को पुलिस के उत्पीड़न से बचाने के लिए मजिस्ट्रेट के सामने ये गवाहियां दी थीं, अतः उन्हें प्रामाणिक न माना जाये । गवाहों के बयानों के बाद मुख्य न्यायाधीश ने सावरकर से अपना पक्ष रखने को कहा । निर्भीक सावरकर ने कहा :

मैं अपने विरुद्ध लगाए गये आरोपों में निर्दोष हूं । मैंने इंग्लैंड में मुकदमे की कार्यवाही में भाग लिया था, क्योंकि वहां की अदालतें जनता द्वारा समर्पित लोकतांत्रिक नियमों के आधार पर बनाई गयी हैं । ऐसी अदालतों में न्याय पाने की उम्मीद की जा सकती है । वहां सत्ता दमन और क्रूरता का सहारा नहीं लेती । भारतीय न्यायालयों में स्थिति इसके विपरीत है । मैं भारतीय न्यायालयों के अधिकार-क्षेत्र के अधीन नहीं हूं, इसलिए कोई भी बयान देने या अपने बचाव के लिए प्रमाण प्रस्तुत करने से इंकार करता हूं ।"

 

इसके बाद वकीलों की बहस हुई । एडवोकेट जनरल ने एक लंबा भाषण दिया जो एक सप्ताह तक चला । हालांकि सावरकर का नाम सूची में अंतिम था लेकिन उन्होंने सावरकर से ही आरंभ किया । बचाव पक्ष के वकीलों ने भी अनेकों अभियुक्तों की तरफ से अपने तर्क देने में लगभग एक सप्ताह का समय लिया । इस दीर्घकालिक मुकदमे के ६८वें दिन शनिवार २३ दिसंबर १९१० को न्यायाधीशों ने अपना निर्णय सुनाया । उनके द्वारा आसन ग्रहण करते वक्त अदालत में गहरी चुप्पी छाई थी । मुख्य न्यायाधीश ने सावरकर से सजाएं सुनाने की शुरुआत की ।

 

"विनायक दामोदर सावरकर, यह अदालत तुम्हें आजीवन निर्वासन का दंड और तुम्हारी सारी संपत्ति जब्त करने का आदेश देती है ।"

उसके बाद अन्य अभियुक्तों को सजा सुनाई गयी । ये निर्णय एकपक्षीय और निरंकुश थे और अभियोग पक्ष के अनजांचे प्रमाणों पर आधारित थे । फ्रांसिसी भूमि पर उनकी गिरफ्तारी की वैधता ट्रिब्यूनल के लिए कोई महत्व नहीं रखती थी । यह तथ्य कि उन्हें गैर-कानूनी वारंट पर भारत लाया गया, उनके लिए विचार का मुद्दा ही नहीं था । दूसरे भारतीयों को सबक सिखाने के लिए उन्हें दंड देना जरूरी था । विशेष ट्रिब्यूनल ने एक ऐसे व्यक्ति पर निर्णय दिया था, जिसका मामला 'द हेग' की मध्यस्थ-निर्णय अदालत में विचाराधीन था । साम्राज्यवाद द्वारा शासित देश में न्याय भी एक निरंकुश चेहरा पहन लेता है और सच को जोखिम में डालता है ।

 

वीर सावरकर को हमेशा के लिए जेल के सलाखो के पीछे डाल दिया गया । हमेशा के लिए उनकी जबान बंद करने के उद्देश्य से उन्हें अंडमान भेज दिया गया । यहां यह बताना भी महत्वपूर्ण होगा कि लार्ड सिडेनहैम की भारत सरकार ने निर्वासन के इस आदेश से संतुष्ट न होकर सावरकर पर एक और मुकदमा बना दिया । इस बार उन पर नासिक के कलक्टर श्री जैक्सन की हत्या के लिए उकसाने का अभियोग लगाया गया ।

भारत सरकार अंडमान की जेल से पच्चीस साल बाद उनकी वापिसी की आशंका से ही भयभीत थी । उन्हें उसी विशेष ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत किया गया । वही नाटक फिर दोहराया गया । इस मुकदमे में भी सावरकर अपने उसी अकाट्य तर्क पर अड़े रहे । उन्होंने भारत सरकार के न्यायाधिकार को मानने से इंकार किया क्योंकि उससे अंतर्राष्ट्रीय अदालत में चल रहे उनके मुकदमे के पूर्वाग्रह ग्रस्त होने की संभावना थी ।

दूसरा मुकदमा २३ जनवरी १९११ को शुरू हुआ । एडवोकेट जनरल द्वारा मुकदमे का समाहार करने के बाद सावरकर को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए अदालत के कठघरे में लाया गया । सावरकर ने अपने निर्दोष होने की बात दोहराते हुए कहा कि उनका इस अपराध से प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई संबंध नहीं था । उन्होंने अदालत को इस बात पर गौर करने को कहा कि उनकी तथाकथित सहभागिता का, ट्रिब्यूनल के सामने लाया गया एकमात्र प्रमाण यह था कि चेंगेरी राव के पास “वंदे मातरम” पर्चे की एक प्रति पाई गयी थी, लेकिन उसका संबंध भी जैक्सन की हत्या से नहीं था क्योंकि प्रमाणों से स्पष्ट था कि वह पर्चा हत्या के बाद लंदन से भेजा गया था । जहां तक उस पिस्तौल का संबंध था, जिससे जैक्सन की हत्या की गयी, इस बात को दृढ़तापूर्वक कहा गया कि इस बात का कोई पर्याप्त सबूत न था कि सावरकर ही वह व्यक्ति था जिसने सरकारी गवाह चतुर्भुज के हाथ २० ब्राउनिंग पिस्तौलें भेजी थीं ।

 

सरकारी गवाहों की अस्पष्ट, अंतर्विरोधी और असंगत गवाहियों के बावजूद ३० जनवरी १९११ को ट्रिब्यूनल ने सावरकर को एक और आजीवन निर्वासन की सजा दी । सावरकर ने तब खड़े होकर ये यादगार शब्द कहे :

मैं आपके कानूनों द्वारा दिए गये इस कठोर दंड को बिना किसी द्वेष के झेलने को तैयार हूं, क्योंकि मेरा विश्वास है कि सिर्फ त्याग करने और कष्ट सहने से ही हमारी प्यारी मातृभूमि बेशक तीव्र गति से न सही, लेकिन एक सुनिश्चित विजय की तरफ अग्रसर होगी ।“

एक व्यक्ति के लिए दो बार आजीवन निर्वासन की सजा असाधारण तो है, पर समझ में बेशक आती है, जबकि विदेशी शक्ति देशी जनता पर राज कर रही हो । यह सजा भारत में अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए 'न्याय' का इस्तेमाल करने के लिए विलक्षण तो थी ही, भारतीय न्यायिक इतिहास में अन्याय की मिसाल भी थी । भारत में ब्रिटिश सरकार विपरीत प्रचार के भय से इतनी आतंकित थी कि इतने महत्वपूर्ण मुकदमों के निर्णय तक न्याय-रिपोर्टों में प्रकाशित नहीं किए गये । इतना ही नहीं, अखबारों ने भी डर के मारे इन्हें नहीं छापा ।

 

मुकदमे के फैसले के बाद सावरकर को बंबई की डोंगरी जेल से (जहां उन्हें मुकदमे के दौरान रखा गया था), भायखला जेल में और वहां से थाणे जेल में लाया गया, जहां से उन्हें ४ जुलाई १९११ को अंडमान जेल में पहुंचा दिया गया । वहां उन्हें एकांत कारावास में रखा गया, लेकिन न तो उन्होंने अपना आत्मसंयम खोया और न ही उनके हौसले कम हुए । कुछ समय बाद सारे देश में सावरकर की रिहाई के लिए शोर मचने लगा, तो सरकार के लिए इस मांग को दबाना मुश्किल हो गया ।

 

प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत १९२१ में उन्हें भारत लाया गया और यरवदा जेल में रखा गया । सन् १९२३ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने काकीनाडा अधिवेशन में सावरकर की रिहाई की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया । आशा की एक किरण दिखाई दी । बंबई के गर्वनर सर जार्ज लॉयड अपने सभासदों के साथ सावरकर से साक्षात्कार करने के लिए आये । सेल्युलर जेल के सुपरिटेंडेंट ले. कर्नल जे.एच. मुर्रे, आई.एम.एस. अब यरवदा जेल में सुपरिटेंडेंट थे । सावरकार के साथ गर्वनर और सभासदों के विचार-विमर्श के आधार पर रिहाई की शर्तें तैयार की गयीं । सावरकर ने इन्हें स्वीकार करते हुए एक इकरारनामे पर हस्ताक्षर किये और ६ जुलाई १९२४ को उनकी सप्रतिबंध रिहाई कर दी गयी ।  ये शर्तें थीं :

सावरकर को रत्नागिरी जिले में ही रहना होगा और इस जिले की सीमाओं से बाहर जाने के लिए सरकार की या संकटकाल में जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी ।

वह सरकार की स्वीकृति के बिना, व्यक्तिगत या सार्वजनिक रूप से, किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेंगे । यह प्रतिबंध पांच साल के लिए है, जिसे उक्त समयावधि समाप्त होने के बाद सरकार की मर्जी से बढ़ाया जा सकता है ।

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